॥ अमृत-वाणी - २२ ॥


जो मनुष्य उसे प्रेम के साथ खोजता है, वह सब सुखों की खान इस भक्ति रूपी मणि को पा जाता है, संत तुलसीदास जी कहतें हैं श्री हरि के दास श्री हरि से भी बढ़कर होते हैं।
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श्री हरि की भक्ति द्वारा ही वैराग्य रूपी ढाल से अपने को बचाते हुए और ज्ञान रूपी तलवार से मद, लोभ और मोह रूपी शत्रुओं को मारकर विजय को प्राप्त किया जा सकता है।
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श्री हरि की भक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी दुःख नहीं होता है, जगत में वे ही मनुष्य विद्वानों के शिरोमणि हैं जो उस मणि को पाने का प्रयत्न करते हैं।
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श्री हरि समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ है, श्री हरि चंदन के वृक्ष हैं तो संत पवन हैं, सब साधनों का फल सुंदर हरि भक्ति ही है, उसे संतो की संगति करके ही प्राप्त किया जा सकता है।
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भक्ति रूपी मणि के प्रकाश से अविद्या का प्रबल अंधकार मिट जाता है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास कभी नहीं जा पाते हैं, मद, मत्सर आदि पतंगों का सारा समूह हार जाता है।
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जिसके हृदय में भक्ति बसती है, उसके लिए विष, अमृत बन जाता है और शत्रु, मित्र बन जाता है, बड़े से बड़े मानसिक रोग भी उसको कोई हानि नहीं पहुँचा पाते हैं, जिनके कारण सभी मनुष्य दुःखी होते है।
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भक्ति रूपी मणि तो उस दीपक के समान होती है, जिसे लोभ रूपी हवा कभी बुझा नहीं सकती है, उस मणि को किसी अन्य की सहायता की अवश्यकता नही होती है क्योंकि यह मणि स्वयं प्रकाशित होती है।
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संत पुरूष वेद-पुराण रूपी पर्वतों में से, श्री हरि की कथा रूपी सुंदर खानों में से, ज्ञान और वैराग्य रूपी दो नेत्रों से तलाश करके, बुद्धि रूपी कुदाल से, भक्ति रूपी मणि को निकाल कर हृदय में धारण कर लेते हैं।
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संत पुरूष वेद-पुराण रूपी समुद्र से, वैराग्य रूपी मंदराचल को मथानी बनाकर, काम, क्रोध, लोभ रूपी असुरों और धैर्य, क्षमा, संयम रूपी देवताओं द्वारा मोह रूपी वासुकि नाग की रस्सी से मथ कर कथा रूपी अमृत को निकाल कर पीतें है।
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भक्ति तो भगवान का परम-प्रेम स्वरूप है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य शुद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, आनन्दमय हो जाता है, पूर्ण-तृप्त हो जाता है।
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भक्ति प्राप्त हो जाने पर मनुष्य के मन में कोई भी सांसारिक कामनायें नहीं रहतीं हैं क्योकि भक्ति सांसारिक कर्मों और वैदिक कर्मों से श्रेष्ठ होती है।
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भक्ति, कर्म-योग और ज्ञान-योग से अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि कर्म-योग और ज्ञान-योग दोनों में भक्ति का आचरण करने पर ही भक्ति रूपी परम-फ़ल प्राप्त होता है।
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भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य आनन्दित हो जाता है, संसार के प्रति उदासीन हो जाता है, एकान्त पसन्द हो जाता है और अपने आप में ही सन्तुष्ट रहता है।
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भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य केवल भगवान को ही देखता है, भगवान को ही सुनता है, भगवान के बारे में ही बोलता है और भगवान का ही चिन्तन करता है।
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भगवान पर अपना सब छोड़ देना, भगवान को भूल जाने पर परम व्याकुल हो जाना और भगवान के आनन्द में ही आनन्दित होना ही शुद्ध-भक्ति का लक्षण हैं।
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॥ अमृत-वाणी - २१ ॥


भक्ति तो ईश्वर के लिये परम-प्रेम रूप, अमृत स्वरूप है, जिसे प्राप्त कर मनुष्य तृप्त हो जाता है, सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है।
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मनुष्य को यज्ञ, दान और तप रुपी कर्मो का कभी त्याग नही करना चाहिये लेकिन आसक्ति और फ़लों का त्याग अवश्य करना चाहिये।
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भक्ति में भक्त स्वयं को, इस संसार को, और धर्म-कर्म को भगवान को अर्पित करके, सिद्ध हो जाने पर लोक व्यवहार कभी नही त्यागता है।
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परमात्मा के प्रति निर्मल चित्त, दृड़ श्रद्धा और सच्ची आस्था होने से भजन स्वयं होने लगता है, किसी भी बाह्य आडंबर की आवश्यकता नही है।
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भक्ति तो परम-प्रेम स्वरूप है जिसे बताया नहीं जा सकता, इसे प्राप्त कर मनुष्य उसी को देखता है, उसी को सुनता है, उसी के बारे में बोलता है।
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जिसने इस मानव शरीर में परम-ब्रह्म को जान लिया, वही बुद्धिमान है, ऎसे बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक जीव मात्र में परम-ब्रह्म को देखते हुए इस संसार से जाते हैं, वह अमर हो जाते हैं।
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गृहस्थ सच्चा है, तो उसका घर अवश्य स्वर्ग बन जाएगा, क्योंकि सच्चे गृहस्थ में आत्म-नियंत्रण, आत्म-समपर्ण सेवाभाव एवं त्याग की भावना होती है, उसे आत्म-साक्षात्कार में कोई कठिनाई नहीं होगी।
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वही सच्चा गृहस्थ है, जिसने अपनी आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है और उसका मन भगवान में स्थिर हो गया, जो परमार्थ के लिए समर्पित हमेशा अग्रसर रहता है, वही सच्चा संत है।
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यदि मन प्रार्थनामय हो जाए और हृदय पूजा की भावना से ओत-प्रोत हो जाए, तो निश्चय ही घर परब्रह्म, परमात्मा का पावन मंदिर बन जाएगा और परमानंद प्राप्ति स्वत: हो जाएगी।
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जब तक मन में ईर्ष्या रहे तब तक समझना चाहिये कि भक्ति का प्रवेश नही हुआ है, तब तक भक्ति के नाम से कोई और ही खेल चल रहा है; अहंकार कोई नई यात्रा कर रहा है।
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श्री हरि की भक्ति सुंदर चिंतामणि है, यह जिसके हृदय में बसती है, वह संतों का संग करता है, जिससे इस मणि को प्राप्त करना सुलभ हो जाता है।
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भक्ति रूपी मणि तो स्वयं धन-रूप है, मोह रूपी दरिद्रता उसके समीप कभी नहीं आ पाती है, उस मणि के बिना कोई भी सुखी नहीं रह सकता है।
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भक्ति रूपी मणि तो स्वयं प्रकाशमान होती है, काम रूपी अन्धकार की छाया तो उसका स्पर्श भी नही कर पाती है, उस मणि के बिना प्रकाश असंभव है।
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श्री हरि की भक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, वह दिन-रात अपने आप ही परम प्रकाश रूप रहता है, उसको दीपक, घी और बत्ती की आवश्यकता नही होती है।
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जबकि वह मणि जगत्‌ में प्रकट है, फ़िर भी बिना श्री हरि की कृपा के उसे कोई पा नहीं सकता है, उसके पाने के उपाय भी सुगम ही हैं, पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं।
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