॥ अमृत-वाणी - २३ ॥


भक्ति वह प्रेम स्वरूप है जिसे बताया नहीं जा सकता है बल्कि स्वयं ही अनुभव किया जा सकता है जिनको भगवान का अनुभव हो जाता है उनमें भक्ति स्वयं प्रकाशित होती है ।
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भक्ति प्राप्त करके, मनुष्य न कभी और कुछ चाहता है, न ही शोक करता है, न घृणा करता है, न ही किसी वस्तु में रमता है, वह अन्य विषयों की तरफ उत्साह रहित हो जाता है।
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भगवान का अनुभव हुए बिना किया प्रेम साधारण-भक्ति ही होती है, ऎसा निश्चय हो जाने के बाद भी शास्त्रों में बताये कर्मों को करना चाहिये, वरना पतन होने की आशंका रहती है।
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भक्ति को प्राप्त करने वाला सांसारिकता को भी निभाता रहता है क्योकि स्नान, भोजन आदि जितने भी इस शरीर से जुड़े कर्तव्य कर्म हैं वे सब शरीर धारण किये हुओं को करने ही पड़ते हैं।
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ईश्वर में ही अनन्य भाव, और इसके विरुद्ध विषयों के प्रति उदासीनता, संसारिक और वेदिक कर्म जो भक्ति के अनुकूल हों उनका आचरण करना और उसके विरुद्ध विषयों में उदासीन हो जाता है।
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वेद-शास्त्रों से भगवान को केवल जाना जा सकता है, लेकिन प्राप्त केवल भक्ति से ही किया जा सकता है, इसलिये सभी वैदिक कर्मों को भगवान को अर्पित करके, संसारिक हानि कि चिन्ता मत करो।
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भगवान की अनन्य-भक्ति केवल भगवान की कृपा से ही मिल पाती है, जब तक अनन्य भक्ति प्राप्त न हो जाये तब तक कर्म तो करना ही पडता है, भक्ति के प्राप्त होने पर ही वास्तविक ज्ञान स्वयं प्रकट होता है।
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जब तक भगवान की कृपा प्राप्त नही होती है, तब तक सभी अज्ञान में ही रहकर कर्म में ही प्रवृत रहते है लेकिन कृपा प्राप्त होते ही ज्ञान स्वयं प्रकट हो जाता है, तभी मनुष्य शुद्ध-भक्ति में स्थिर हो पाता है।
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प्रसन्नता पूर्वक अपमान सहन करने से और नम्रता धारण करने से अहंकार मिट जाता है।
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कोई भी मनुष्य न तो खाली हाथ इस संसार में आता है और न ही खाली हाथ इस संसार से जाता है।
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जन्म और मृत्यु संस्कारों पर आधारित होती है और संस्कारों का उत्पन्न न होना ही मुक्ति है।
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मनुष्य पुराने संस्कारों को भोगने के लिये संसार में आता है और नये संस्कारों को साथ लेकर संसार से चला जाता है।
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संस्कारो की उत्पत्ति सकाम-भाव से कर्म करने से होती है और निष्काम-भाव से कर्म करने से संस्कारो की उत्पत्ति कभी नही होती है।
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भगवान को याद करने से वास्तविक संपत्ति जमा होती है और भगवान को भूल जाने से विपत्तियाँ ही जमा होती है।
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अपने अन्दर सत्य के प्रकाश को सदा प्रकाशित रखोगे तो क्रोध, भय और लोभ रूपी अन्धकार तुम्हारे पास कभी नहीं आ पायेंगे।
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कामनाओं की पूर्ति का होना ही कामनाओं का अन्त है लेकिन कामनाओं की पूर्ति होने पर यह अवश्य ध्यान रहे कि नई कामनाओं का जन्म न होने पाये।
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॥ अमृत-वाणी - २२ ॥


जो मनुष्य उसे प्रेम के साथ खोजता है, वह सब सुखों की खान इस भक्ति रूपी मणि को पा जाता है, संत तुलसीदास जी कहतें हैं श्री हरि के दास श्री हरि से भी बढ़कर होते हैं।
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श्री हरि की भक्ति द्वारा ही वैराग्य रूपी ढाल से अपने को बचाते हुए और ज्ञान रूपी तलवार से मद, लोभ और मोह रूपी शत्रुओं को मारकर विजय को प्राप्त किया जा सकता है।
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श्री हरि की भक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी दुःख नहीं होता है, जगत में वे ही मनुष्य विद्वानों के शिरोमणि हैं जो उस मणि को पाने का प्रयत्न करते हैं।
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श्री हरि समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ है, श्री हरि चंदन के वृक्ष हैं तो संत पवन हैं, सब साधनों का फल सुंदर हरि भक्ति ही है, उसे संतो की संगति करके ही प्राप्त किया जा सकता है।
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भक्ति रूपी मणि के प्रकाश से अविद्या का प्रबल अंधकार मिट जाता है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास कभी नहीं जा पाते हैं, मद, मत्सर आदि पतंगों का सारा समूह हार जाता है।
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जिसके हृदय में भक्ति बसती है, उसके लिए विष, अमृत बन जाता है और शत्रु, मित्र बन जाता है, बड़े से बड़े मानसिक रोग भी उसको कोई हानि नहीं पहुँचा पाते हैं, जिनके कारण सभी मनुष्य दुःखी होते है।
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भक्ति रूपी मणि तो उस दीपक के समान होती है, जिसे लोभ रूपी हवा कभी बुझा नहीं सकती है, उस मणि को किसी अन्य की सहायता की अवश्यकता नही होती है क्योंकि यह मणि स्वयं प्रकाशित होती है।
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संत पुरूष वेद-पुराण रूपी पर्वतों में से, श्री हरि की कथा रूपी सुंदर खानों में से, ज्ञान और वैराग्य रूपी दो नेत्रों से तलाश करके, बुद्धि रूपी कुदाल से, भक्ति रूपी मणि को निकाल कर हृदय में धारण कर लेते हैं।
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संत पुरूष वेद-पुराण रूपी समुद्र से, वैराग्य रूपी मंदराचल को मथानी बनाकर, काम, क्रोध, लोभ रूपी असुरों और धैर्य, क्षमा, संयम रूपी देवताओं द्वारा मोह रूपी वासुकि नाग की रस्सी से मथ कर कथा रूपी अमृत को निकाल कर पीतें है।
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भक्ति तो भगवान का परम-प्रेम स्वरूप है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य शुद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, आनन्दमय हो जाता है, पूर्ण-तृप्त हो जाता है।
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भक्ति प्राप्त हो जाने पर मनुष्य के मन में कोई भी सांसारिक कामनायें नहीं रहतीं हैं क्योकि भक्ति सांसारिक कर्मों और वैदिक कर्मों से श्रेष्ठ होती है।
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भक्ति, कर्म-योग और ज्ञान-योग से अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि कर्म-योग और ज्ञान-योग दोनों में भक्ति का आचरण करने पर ही भक्ति रूपी परम-फ़ल प्राप्त होता है।
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भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य आनन्दित हो जाता है, संसार के प्रति उदासीन हो जाता है, एकान्त पसन्द हो जाता है और अपने आप में ही सन्तुष्ट रहता है।
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भक्ति को प्राप्त करके मनुष्य केवल भगवान को ही देखता है, भगवान को ही सुनता है, भगवान के बारे में ही बोलता है और भगवान का ही चिन्तन करता है।
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भगवान पर अपना सब छोड़ देना, भगवान को भूल जाने पर परम व्याकुल हो जाना और भगवान के आनन्द में ही आनन्दित होना ही शुद्ध-भक्ति का लक्षण हैं।
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॥ अमृत-वाणी - २१ ॥


भक्ति तो ईश्वर के लिये परम-प्रेम रूप, अमृत स्वरूप है, जिसे प्राप्त कर मनुष्य तृप्त हो जाता है, सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है।
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मनुष्य को यज्ञ, दान और तप रुपी कर्मो का कभी त्याग नही करना चाहिये लेकिन आसक्ति और फ़लों का त्याग अवश्य करना चाहिये।
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भक्ति में भक्त स्वयं को, इस संसार को, और धर्म-कर्म को भगवान को अर्पित करके, सिद्ध हो जाने पर लोक व्यवहार कभी नही त्यागता है।
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परमात्मा के प्रति निर्मल चित्त, दृड़ श्रद्धा और सच्ची आस्था होने से भजन स्वयं होने लगता है, किसी भी बाह्य आडंबर की आवश्यकता नही है।
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भक्ति तो परम-प्रेम स्वरूप है जिसे बताया नहीं जा सकता, इसे प्राप्त कर मनुष्य उसी को देखता है, उसी को सुनता है, उसी के बारे में बोलता है।
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जिसने इस मानव शरीर में परम-ब्रह्म को जान लिया, वही बुद्धिमान है, ऎसे बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक जीव मात्र में परम-ब्रह्म को देखते हुए इस संसार से जाते हैं, वह अमर हो जाते हैं।
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गृहस्थ सच्चा है, तो उसका घर अवश्य स्वर्ग बन जाएगा, क्योंकि सच्चे गृहस्थ में आत्म-नियंत्रण, आत्म-समपर्ण सेवाभाव एवं त्याग की भावना होती है, उसे आत्म-साक्षात्कार में कोई कठिनाई नहीं होगी।
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वही सच्चा गृहस्थ है, जिसने अपनी आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है और उसका मन भगवान में स्थिर हो गया, जो परमार्थ के लिए समर्पित हमेशा अग्रसर रहता है, वही सच्चा संत है।
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यदि मन प्रार्थनामय हो जाए और हृदय पूजा की भावना से ओत-प्रोत हो जाए, तो निश्चय ही घर परब्रह्म, परमात्मा का पावन मंदिर बन जाएगा और परमानंद प्राप्ति स्वत: हो जाएगी।
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जब तक मन में ईर्ष्या रहे तब तक समझना चाहिये कि भक्ति का प्रवेश नही हुआ है, तब तक भक्ति के नाम से कोई और ही खेल चल रहा है; अहंकार कोई नई यात्रा कर रहा है।
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श्री हरि की भक्ति सुंदर चिंतामणि है, यह जिसके हृदय में बसती है, वह संतों का संग करता है, जिससे इस मणि को प्राप्त करना सुलभ हो जाता है।
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भक्ति रूपी मणि तो स्वयं धन-रूप है, मोह रूपी दरिद्रता उसके समीप कभी नहीं आ पाती है, उस मणि के बिना कोई भी सुखी नहीं रह सकता है।
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भक्ति रूपी मणि तो स्वयं प्रकाशमान होती है, काम रूपी अन्धकार की छाया तो उसका स्पर्श भी नही कर पाती है, उस मणि के बिना प्रकाश असंभव है।
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श्री हरि की भक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, वह दिन-रात अपने आप ही परम प्रकाश रूप रहता है, उसको दीपक, घी और बत्ती की आवश्यकता नही होती है।
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जबकि वह मणि जगत्‌ में प्रकट है, फ़िर भी बिना श्री हरि की कृपा के उसे कोई पा नहीं सकता है, उसके पाने के उपाय भी सुगम ही हैं, पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं।
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॥ अमृत-वाणी - २० ॥


श्री "मद्‍ भगवत-गीता" भगवान द्वारा गाया गीत (परम ज्ञान) है और "श्री मद्‍ भागवत-पुराण" भक्त द्वारा भगवान को प्राप्त करने शैक्षिक कथायें है।
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नित्य गीता का अभ्यास करने वाला मनुष्य की यदि मृत्यु जाती है तो वह फ़िर मनुष्य योनि में जन्म लेकर पुन: अभ्यास करके परमगति को प्राप्त होता है।
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प्रारब्ध को भोगता हुआ जो मनुष्य नित्य "श्री मद्‍ भगवत-गीता" का अभ्यास करता होता है वही इस लोक में मुक्त और सुखी होता है तथा कर्म में लिप्त नहीं होता।
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जिस प्रकार कमल के पत्ते को जल स्पर्श नहीं करता है उसी प्रकार जो मनुष्य "श्री मद्‍ भगवत-गीता" का ध्यान करता है उसे पाप कभी स्पर्श नहीं करते है।
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आँख के अंधे संसार को, कामना के अंधे विवेक को, अभिमान के अंधे अपने से श्रेष्ठ को और लालच के अंधे स्वयं के दोषों को कभी नहीं देख सकतें है।
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जो जीवात्मा अपने मन रूपी रेत में परमात्मा रूपी सीमेंट को अच्छी तरह से मिश्रित कर लेता है तो बडे से बडा भूकम्प भी उसको हिला नही पाता है।
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भगवान कहते है, मैं श्रीगीता के आश्रय में रहता हूँ, श्रीगीता मेरा उत्तम घर है और श्री गीता के ज्ञान का आश्रय करके मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।
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जिस प्रकार संसार का अंधकार सूर्य के प्रकाश से दूर होता है, उसी प्रकार जीवात्मा का अज्ञान रुपी अन्धकार आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से दूर हो सकता है।
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कामनायें, क्रोध और लोभ मनुष्य के तीन मुख्य शत्रु है, कामनाओं को भगवान के नाम जप से, क्रोध को प्रेम से और लोभ को परमार्थ से जीता जा सकता है।
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यदि मुक्त जीवन जीना चाहते हो तो सहज-भाव से कुछ भी करना, कुछ भी पाना और किसी भी प्रकार का विरोध करना छोडने का अभ्यास करना अभी से शुरु कर दो।
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भगवान के भक्त का व्यवहार सदैव सभी के प्रति मन से मधुर, वचन से मधुर और शरीर से मधुर ही होता है।
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कोई भी मनुष्य तब तक किसी को सच्चा सुख नही दे सकता है जब तक अपने अभिमान का त्याग नही करता है।
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जिसके मन में भगवान से निरन्तर प्रीत बनी रहती है तो उसके मुख से निकला हुआ प्रत्येक शब्द हीरे-मोती के समान होता है।
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सच्चा बैरागी वही है जो मन से विरक्त होता है, सच्चा गृहस्थ वही है, जो मन से उदार होता है नहीं तो दोनों का पतन निश्चित है।
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परमात्मा को पाने के लिए पूर्ण निष्ठा भाव से वही मार्ग चुनना चाहिए, जो स्वयं को अच्छा लगे, परमात्मा तो सभी मार्गो से सहज, सुलभ है।
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॥ अमृत-वाणी - १९ ॥


जब जीव मन और बुद्धि से संसार को जानने की कौशिश करता है तब वह अज्ञानतावश सासारिक सुख-दुख भोगने लगता है, और जब जीव मन और बुद्धि से आत्मा को जानने की कौशिश करता है तभी वह आत्मिक-आनन्द प्राप्त करने लगता है।
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जब जीव स्वयं को कर्ता मानकर और आत्मा को अकर्ता मानकर कार्य करता है, तब जीव कर्ता-भाव के कारण कर्म-बंधन में फ़ंसकर कर्म के अनुसार सुख-दुख भोगता है, और जब जीव स्वयं को अकर्ता देखकर और आत्मा को कर्ता देखकर कार्य करता है, तब जीव अकर्ता-भाव के कारण मुक्ति को प्राप्त करता है।
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जीवात्मा दो तत्वों से मिलकर बना है, (जीव-तत्व + आत्म-तत्व = जीवात्मा) जो मनुष्य इन दोनों तत्वों को अलग-अलग अनुभव कर लेता है वह हंस अवस्था को प्राप्त होता है और जो मनुष्य इन दोनों तत्वों को अलग-अलग करने के बाद जीव-तत्व को आत्म-तत्व में विलीन कर देता है वह परमहंस अवस्था को प्राप्त हो जाता है।
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जीव, माया के प्रभाव से आज्ञान से आवृत होने के कारण वह क्षणिक सुख के लिये घोर कष्ट उठाता रहता है, जीव यह जानता है सुख स्थिर रहने में है लेकिन वह दूसरों से अधिक ज्ञानी समझकर निरन्तर दौड़ लगाता रहता है और स्वयं को ही धोखा देता रहता है।
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जीव, माया के प्रभाव से तब तक अज्ञानी बना रहता है जब तक परमात्मा रूपी सद्‍गुरु नही मिलता है, सद्‍गुरु की कृपा से जीव माया-पति (भगवान) की शरणागति प्राप्त करके ब्रह्म-ज्ञान में स्थित होकर मुक्त हो जाता है।
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जो भगवान की कृपा प्राप्त कर लेते है उनको सभी देवी-देवताओं की कृपा स्वत: ही प्राप्त जाती है।
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अनेक देवी-देवताओं को वही पूजते है जिनकी बुद्धि सांसारिक कामनाओं द्वारा पथ-भ्रष्ट हो गयी है।
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जो मनुष्य सदा भगवान के विश्वरुप का स्मरण करता है, वह मनुष्य बिना स्नान के भी सदा पवित्र रहता है।
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जो मनुष्य भक्ति-भाव से एकाग्र-चित्त होकर श्रीगीता का अध्यन करता है उसे सभी शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है।
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स्वयं के उद्धार की शुद्ध मन से इच्छा तो करो, भगवान तो सभी जीवात्माओं का उद्धार करने के लिये तत्पर रहते है।
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केवल शान्ति चाहने से शान्ति नही मिल सकती है बल्कि सांसारिक इच्छाओं के शान्त होने पर ही शान्ति मिल सकती है।
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सभी मनुष्यों को नित्य "श्री मद्‍ भगवत-गीता" का अध्यन और "श्री मद्‍ भागवत-पुराण" का श्रवण अवश्य करना चाहिये।
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जिस तरह एक दीपक से पूरे घर का अंधेरा दूर हो जाता है, उसी तरह एक शुद्ध-भक्त से कुल की सात पीडी़यों का उद्धार हो जाता है।
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जिस प्रकार फ़ूलों की सुगंध वातावरण में सब ओर फ़ैल जाती है उसी प्रकार भगवान के भक्त की महक सभी तरफ़ स्वयं फैल जाती है।
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जो मनुष्य स्वयं को उपदेश देता है वही सत्य और असत्य का भेद जान पाता है केवल दूसरों को उपदेश देने वाला असत्य में ही जीता है।
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॥ अमृत-वाणी - १८ ॥


जब जीव को आत्मा से साक्षात्कार होता है तब जीव में ब्रह्म-ज्ञान प्रकट होने लगता है।
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जो अपने मन की क्रियाशीलता पर ध्यान केन्द्रित रखता है, उसी का मन भगवान में स्थिर हो सकता है।
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स्वयं के उद्धार की शुद्ध मन से इच्छा तो करो, भगवान तो सभी जीवात्माओं का उद्धार करने के लिये तत्पर रहते है।
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जब तक विष (सांसारिक-सुख) को अमृत समझकर पीते रहोगे तब तक अमृत (आत्मिक-सुख) को प्राप्त नही कर पाओगे।
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जीव जिस भाव से परमात्मा को भजता (कामना करता) है, परमात्मा भी जीव को उसी भाव से भजता (कामना-पूर्ति करता) है।
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जीव मन से आत्मा को जानना चाहता है लेकिन बुद्धि से संसार को जानना चाहता है, इस भ्रम के कारण न तो आत्मिक-सुख और न ही सांसारिक-सुख भोग पाता है।
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मनुष्य शरीर रथ के समान है, इस रथ में घोंडे़ (इन्द्रियाँ), लगाम (मन), सारथी (बुद्धि) और रथ के स्वामी जीव (कर्ता-भाव) में और आत्मा (द्रृष्टा-भाव) में रहता है।
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जब तक जीव शरीर रुपी रथ को मन रुपी लगाम से बुद्धि रुपी सारथी के द्वारा चलाता रहता है, तब जीव जन्म-मृत्यु के बंधन में फ़ंसकर कर्मानुसार सुख-दुख भोगता रहता है।
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जब जीव का विवेक जाग्रत होता है तब मन रुपी लगाम को बुद्धि रुपी सारथी सहित आत्मा को सोंप देता है तब जीव द्रृष्टा-भाव में स्थित होकर मुक्त हो जाता है।
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बुद्धि से मन रुपी लगाम को खींचकर नही रखोगे तो इन्द्रियाँ रुपी घोंडे, शरीर रुपी रथ को दौड़ाते ही रहेंगे, और अधिक दौड़ने पर शरीर रुपी रथ शीघ्र थक कर टूट जायेगा।
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जब जीव केवल अपने सुख की इच्छा करता है तब मनुष्य शरीर का दुरुपयोग ही करता है, और जब जीव केवल आत्मा के सुख की इच्छा करता है तभी मनुष्य शरीर का सदुपयोग होता है।
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मन में सद-विचार होंगे तो शरीर से सत्कर्म ही होगा और दुर्विचार होंगे तो शरीर से दुष्कर्म ही होगा, दूसरों के सुख की इच्छा करना सद-विचार होते है और अपने सुख की इच्छा करना दुर्विचार होते है।
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आत्मा बिन्दु (बूँद) के समान और परमात्मा सिन्धु (समुद्र) के समान है जिस प्रकार जो गुण समुद्र में है वही गुण समुद्र की बूँद में होता है उसी प्रकार आत्मा गुणों में परमात्मा के समान और मात्रा में परमात्मा से भिन्न है।
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जीव का मन और बुद्धि जब अलग-अलग दिशा में विचार करते हैं तो भ्रम उत्पन्न होने से मन अशान्त हो जाता है, और जब जीव का मन और बुद्धि एक ही दिशा में विचार करते हैं तो मन शान्त रहता है।
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बुद्धि सहित मन को संसार के कार्यों में लगाना भौतिक-कर्म होता है जो कि जन्म-मृत्यु का कारण बनता है, और बुद्धि सहित मन को भगवान के कार्यों में लगाना आध्यात्मिक-कर्म (भक्ति-कर्म) होता है।
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॥ अमृत-वाणी - १७ ॥


व्यवहारिकता में तन और धन की आवश्यकता होती है मन की कोई भूमिका नही होती है।
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जब अपनी वाणी को स्वयं सुनने लगोगे तब स्वभाव में सहजता से परिवर्तन होने लगेगा।
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भगवान का चिंतन करते रहोगे तो सत्कर्म स्वत: ही होने लगेंगे और दुष्कर्मों से बचे रहोगे।
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जब तक पतन और उत्थान का भेद नही जानोगे तब तक पतन के मार्ग पर ही चलते रहोगे।
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एकाग्र-चित्त, दृढ़-श्रद्धा के साथ किये गये पुरुषार्थ से ही स्वार्थ सिद्धि और परमार्थ सिद्धि होती है।
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बुद्धिमान मनुष्य को स्वयं योग्य विचार करके तत्वज्ञानी सदगुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए।
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परिजनों, मित्रों और शुभ-चिंतकों से सम्बन्ध छूटे इससे पहले भगवान पर पूर्ण आश्रित हो जाओ।
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कलियुग में आध्यात्मिक ज्ञान से विमुखता और भौतिक ज्ञान की प्रखरता ही अशान्ति का मुख्य कारण है।
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नियत कर्म (आराधना) करते हुए जो भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगते है वही भगवान के प्रिय भक्त होते हैं।
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मानव शरीर भौतिक उन्नति में व्यर्थ करने के लिये नही है परमात्मा की प्राप्ति करके सफ़ल बनाने के लिये है।
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मिथ्या वह है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है लेकिन सत्य नही होता है, जैसे किसी भी वस्तु की परछाई सत्य जैसी प्रतीत होती है लेकिन सत्य नही हो सकती है उसका स्वरुप विकृत होता है।
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संसार में जब एक जीव दूसरे जीव के मन की बात नही जान सकता है यदि जान सकता है तो सिर्फ़ अपने मन की बात तब किसी की भी निन्दा-स्तुति करके अपना समय बर्बाद कर रहे हो।
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यह भौतिक संसार भी आध्यात्मिक संसार की परछाई है इसलिये संसार मिथ्या है यह सत्य नही हो सकता है, संसार में प्रेम का स्वरुप भी विकृत है, सत्य केवल परमात्मा है वही प्रेम करने योग्य है।
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सनातन का अर्थ होता है जो अनादि है और अनन्त है वह एक मात्र परमात्मा है, भगवान कृष्ण द्वारा गीता में वर्णित वर्णाश्रम धर्म ही सनातन धर्म है जो सनातन धर्म को मानता है वही भगवान का भक्त हो सकता है।
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जब भगवद-प्राप्ति रुपी परम-सिद्धि के लिये जीवात्मा ज्ञान-मार्ग पर शरीर को साधन बनाता है तो अष्ट-सिद्धियों के लालच में फ़ंस जाता है तो घूम-फ़िरकर फ़िर से संसार में ही आ गिरता है, ज्ञान-मार्ग में यही सबसे बडी बाधा है।
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॥ अमृत-वाणी - १६ ॥


मनुष्य जीवन में भगवद-चिंतन में जो समय गुजरता है उसी समय का सदुपयोग होता है बाकी समय का तो दुरुपयोग ही है।
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मनुष्य ही एक मात्र ऎसा जीव है जिसके के लिये संसार में कोई भी वस्तु ऎसी नही है जो प्राप्त करना चाहे और प्राप्त न कर सके।
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मुक्ति मनुष्य शरीर में ही मिलती है जो जीवात्मा मनुष्य शरीर में रहकर मुक्त हो जाती है वह संसार में फ़िर कभी लौटकर नही आती है।
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"मैं" शरीर नही हूँ जब से यह भूलने का अभ्यास करोगे तभी मोक्ष-पथ पर आगे चल सकोगे नही तो दुख के सागर में ही भटकते रहोगे।
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संसार एक सराय (धर्मशाला) है, यहाँ यात्री आते है कुछ समय ठहरतें है और चले जाते है जो अपने को यात्री समझता है वह बंधन से मुक्त रहता है।
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कर्म तीन प्रकार से किये जाते है, १.मन से, २.वाणी से और ३.शरीर से.....मन से विचार करके, वाणी से बोलकर, शरीर से क्रिया करके कर्म होता है।
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अच्छे समय में बुद्धि सत-पथ पर होती है उस समय मन के विचार बुरे होते है तो वाणी और शरीर से सत्कर्म होता दिखाई देता है परन्तु होता दुष्कर्म ही है।
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बुरे समय में बुद्धि पथ-भ्रष्ट हो जाती है उस समय मन के विचार अच्छे होते है तो वाणी और शरीर से दुष्कर्म होता दिखाई देता है परन्तु होता सत्कर्म ही है।
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वे मनुष्य महा-मूर्ख होते है जो छोटी-मोटी ऋद्धियों-सिद्धियों के चक्कर में अपने शरीर को घोर कष्ट देते हैं और जीवन के बहुमूल्य समय का दुरूपयोग करते है।
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वर्णाश्रम धर्म की शिक्षा से ही मनुष्य का स्वच्छ चरित्र का निर्माण होगा, स्वच्छ चरित्र से ही स्वच्छ समाज का निर्माण होगा और स्वच्छ समाज से स्वच्छ राष्ट्र का निर्माण होगा।
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मन के पीछे भागना बन्द करो, मन के पीछे भागने वाला दुख को प्राप्त होता है।
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आवश्यकता से अधिक धन-संग्रह करोगे, तो पाप-कर्म से कभी नही बच सकोगे।
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जब तक असत्य को सत्य समझते रहोगे तब तक सत्य को कभी नही जान पाओगे।
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सत्याचरण का पालन करने वाला एक दिन सत्य (परमात्मा) में स्थित हो जाता है।
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सत्य और असत्य, पाप और पुण्य के भेद को जानने में, शास्त्र ही एक मात्र प्रमाण है।
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॥ अमृत-वाणी - १५ ॥


इस जीवन की अन्तिम श्वास के वक्त जिस किसी स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, भूत-प्रेत, देवी-देवता आदि किसी का भी स्मरण करोगे तो अगले जीवन में वही शरीर प्राप्त होगा।
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जल और मन की गति हमेशा नीचे की ओर होती है, जल को पंप रुपी यंत्र और मन को भगवद-नाम रुपी मंत्र दे दोगे तो दोनो की गति ऊपर की तरफ़ हो जायेगी।
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जब जीवात्मा अपनी बुद्धि तन और धन से हटाकर मन की ओर लगाने का निरन्तर अभ्यास करता है, तब वह जीवात्मा एक दिन अपने को महापुरुषों की श्रेणी मे खडा पाता है।
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निरन्तर सत्संग करते रहने पर जीव को जब अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है तब सांसारिक मोह से छूट जाता है इसलिये अन्तिम समय में केवल परमात्मा का स्मरण शेष रह जाता है।
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जीवात्मा मॄत्यु के वक्त जिस स्वरुप का ध्यान करके शरीर त्यागता है उसी शरीर को प्राप्त करता है इसलिये कर्म इस प्रकार करो जिससे अन्तिम श्वास के वक्त भगवान के स्वरुप का स्मरण हो आये।
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संसार से बैरागी होना तब तक व्यर्थ है जब तक परमात्मा से राग उत्पन्न न हो जाये।
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भगवान का शुद्ध-भक्त ही मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेता है इसलिये भगवान के भक्त बनो।
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जिस भक्त पर भगवान की कृपा हो जाती है भगवान की शक्तियों की कृपा स्वत: ही हो जाती है।
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परमात्मा का अनुभव वही कर पाता है जो मन और बुद्धि से परे चेतन स्वरुप में स्थित हो जाता है।
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जब जीवात्मा जीवन को छोडकर मृत्यु को याद रखता है तो माया-जाल (संसार) में कभी नही फ़ंसता है।
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जब तक सांसारिक व्यवहार को सत्य मानते रहोगे तो सत्य स्वरूप परमात्मा को कभी नही जान पाओगे।
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जीवात्मा जब भूल जाता है कि मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नही तभी सांसारिक मोह में फ़ंस जाता है।
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किसी भी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा हो तो उसे धर्मानुसार उपयोग करोगे तभी उस वस्तु का सुख पा सकोगे।
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वेद-शास्त्र स्वयं भगवान की आज्ञा है भगवान की आज्ञा का उलंघन करके संसार में कौन सुख-शान्ति से रह सकता है।
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साधु और संतों को भेष से नही रहन-सहन और स्वभाव से जाना जाता है, स्वभाव जानने के लिये संग करना आवश्यक है।
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॥ अमृत-वाणी - १४ ॥


जब तक भगवान के अस्तित्व पर अटूट विश्वास नही होगा तब तक पाप करने से नही बच पाओगे।
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शास्त्रानुसार कर्म ही "धर्म" है इसलिये धर्म का सहारा लेकर चलोगे तो पाप-कर्म करने से बचे रहोगे।
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भगवान के नाम रुपी अमृत को पीते रहोगे तो सभी प्रकार की सांसारिक आशक्ति और विपत्ति से बचे रहोगे।
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जब मनुष्य की बुद्धि और मन एक ही दिशा में कार्य करतें है तब सारे भ्रम मिट जाते हैं, तभी मनुष्य का विवेक जागृत हो पाता है।
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जब मनुष्य का विवेक जागृत हो जाता है तब उस व्यक्ति के लिये शरीर एक यन्त्र के समान होता है और धन-सम्पत्ति मिट्टी के समान होती है।
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आत्मा ईश्वर का अंश है जो कि सभी प्राणीयों में समान रूप से स्थित रहता है, इसलिए केवल देवी-देवताओं का ही नहीं बल्कि प्रत्येक प्राणी का आदर करना चाहिये।
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अनेक देवी-देवताओं को पूजने-भजने वाले महामूर्ख होते है, एक देवता पर पूर्ण श्रद्धा रखने वाले ही बुद्धिमान होते है।
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माया (धन-सम्पदा) का पीछा करना छोडो माया-पति (परमेश्वर) का पीछा करोगे माया तो पीछे-पीछे स्वयं दौडी आयेगी।
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जिस प्रकार कोई वस्तु जहाँ पर होती है वहीं ढूंढने पर मिलती है उसी प्रकार सुख और शान्ति जहाँ पर है वहीं तलाश करो।
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जब तक दूसरों में दोषों को खोजते रहोगे तब तक स्वयं के दोषों से अनभिज्ञ रहोगे, तो स्वयं के दोषों का निवारण कैसे होगा।
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अच्छा वक्ता वही होता है जो अच्छा श्रोता होता है इसलिये अच्छा श्रोता बनोगे तो एक दिन अच्छा वक्ता स्वत: ही बन जाओगे।
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शिष्य बनने का प्रयत्न करो, गुरु बनने की कौशिश करोगे तो त्रिशंकु की तरह न तो इस लोक में और न ही परलोक में शान्ति मिलेगी।
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सुख-शान्ति शरीर में नही है वह तो आत्मा में है, इसलिये पहले आत्मा को जानने की जिज्ञासा तो उत्पन्न करो, तभी सुख-शान्ति प्राप्ति होगी।
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जब तक ब्रह्मज्ञानी सदगुरु न मिलें तब तक साधन-भक्ति पथ पर लगे रहना चाहिये, बिना सदगुरु के साधन-भक्ति सफ़ल नही होती है।
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पिछले जन्मों में जैसे कर्म रुपी बीज बो कर आये हो वही इस जन्म में कर्मफ़ल रुपी वृक्ष (शरीर) मिला है और वही फ़ल (सुख-दुख) खा रहे हो।
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इस जन्म में जैसे कर्म रुपी बीज बोओगे आगे के जन्मों मे वैसे ही कर्मफ़ल रुपी वृक्ष (शरीर) प्राप्त करोगे और वैसे ही फ़ल (सुख-दुख) खाने को मिलेंगे।
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॥ अमृत-वाणी - १३ ॥


संसार में दो प्रकार के ब्रह्मज्ञानी सदगुरु होते हैं, १.मौनी ब्रह्मज्ञानी और २.वक्ता ब्रह्मज्ञानी।
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वक्ता ब्रह्मज्ञानी संसार-सागर में व्याप्त सभी जीवात्माओं के उद्धार के लिये प्रयत्नशील रहता हैं।
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मौनी ब्रह्मज्ञानी से संसार को विशेष लाभ नही होता है, वह स्वयं के उद्धार में मग्न रहता है।
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गुरु स्वर्ग के लोकों का पथ-प्रदर्शक होता है, सदगुरु वैकुण्ठ के लोकों का पथ-प्रदर्शक होता है।
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सदगुरु ब्रह्म का ज्ञाता ब्रह्म स्वरुप होता है वह ब्रह्म-ज्ञान के अनुसार भक्ति-मार्ग का पथ-प्रदर्शक होता है।
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गुरु "जीवन" की उन्नति का मार्ग-दर्शक होता है, सदगुरु "मृत्यु" की उन्नति का मार्ग-दर्शक होता है।
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गुरु शास्त्रों का ज्ञाता शिव स्वरुप होता है वह शास्त्र-ज्ञान के अनुसार कर्म-मार्ग का पथ-प्रदर्शक होता है।
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गुरु सांसारिक स्तर पर विवेक जाग्रत करता है और सदगुरु आध्यात्मिक स्तर पर विवेक जाग्रत करता है।
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गुरु स्वभाव से शांतचित्त, साधु-भाव में स्थित, मृदुभाषी, काम-क्रोध से रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं।
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सांसारिक ज्ञान की शिक्षा देने वाला गुरु कहलाता है और ईश्वरीय ज्ञान की शिक्षा देने वाला सदगुरु कहलाता है।
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गुरु का अर्थ हैं "गु" अक्षर का अर्थ गुणातीत और "रु" अक्षर का अर्थ रुपातीत जो गुण और रूप से परे स्थित हैं।
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अच्छा गुरु वही होता है जो अच्छा शिष्य होता है इसलिये अच्छा शिष्य बनोगे तो अच्छा गुरु स्वत: ही बन जाओगे।
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गुरु के प्रति जब जीव की पूर्ण श्रद्धा स्थिर हो जाती है तब उस गुरु शरीर में परमात्मा सदगुरु के रुप में प्रकट होते है।
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गुरु का कर्तव्य धर्मानुसार बोलना और शिष्य का कर्तव्य श्रद्धा पूर्वक सुनकर गुरु की आज्ञा का पालन करना होता है।
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गुरु सांसारिक ज्ञान के अन्तर्गत पाप-पुण्य, सुख-दुख, अपने-पराये, आदर-अनादर, सही-गलत आदि का भेद सिखाते है।
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सदगुरु आध्यात्मिक ज्ञान के अन्तर्गत सत्य-असत्य, तत्व-पदार्थ, आत्मा-शरीर, दिव्य-स्थूल आदि का भेद सिखाते है।
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जीवन में अनेक गुरु जन्म से स्वत: ही मिलते है या बनाने पडतें हैं और सदगुरु भगवान की कृपा से ही प्रकट होते हैं।
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गुरु ऎसा होना चाहिये जिसे हर वक्त शिष्यों का ध्यान हो और शिष्य ऎसा होना चाहिये जिसे गुरु पर स्वयं से अधिक विश्वास हो।
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जब तक गुरु के प्रति दृढ़ श्रद्धा और वाणी पर पूर्ण विश्वास नही होगा, तब तक चित्त की स्थिरता और ज्ञान की प्राप्ति असंभव है।
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मनुष्य के प्रथम गुरु माता-पिता ही होते है फ़िर पति-पत्नी एक दूसरे के गुरु होते है अन्त में दीक्षा-गुरु बनाना होता है बिना गुरु-भक्ति के सदगुरु की प्राप्ति नही होगी।
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॥ अमृत-वाणी - १२ ॥


जैसा व्यवहार दूसरों के द्वारा चाहते हो वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ करोगे तो सभी मत-भेद मिट जायेंगे।
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यदि मन भगवान में लगाओगे तो मन सरलता से स्थिर हो जायेगा, स्थिर मन वाला ही सुख को प्राप्त होता है।
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निरन्तर मन और बुद्धि को भगवान मे लगाने वालों का अति शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-सागर से उद्धार होता है।
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संसार सागर को पार करने के लिये भगवान के चरण रुपी नाव का सहारा लोगे तो आसानी से पार हो जाओगे।
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निरन्तर मन और बुद्धि को भगवान मे लगाने वालों का अति शीघ्र ही दुख रूपी संसार-सागर से उद्धार होता है।
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जो सभी प्राणियों में एक मात्र अपनी आत्मा का अनुभव करता है, वही स्थिर मन वाला सत्य को जानने वाला है।
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संसार में जो कुछ भी तुम्हारा है उसे भगवान का समझकर उपयोग करोगे तो भगवद-प्राप्ति रुपी परम-सिद्धि को पाओगे।
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ज्ञान-योगी से भक्ति-योगी का मार्ग आसान है, ज्ञान-योगी स्वयं के भरोसे और भक्ति-योगी परमात्मा के भरोसे चलता है।
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तुम जो कुछ भी करते हो उसके फ़ल को पहले भगवान को अर्पित करके चलोगे तो भगवान प्राप्ति रुपी परम-सिद्धि को पाओगे।
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शास्त्रों का सार न जानने से शास्त्र-अध्यन श्रेष्ठ है, शास्त्र-अध्यन से ध्यान श्रेष्ठ है, ध्यान से सभी कर्मफ़लों का त्याग श्रेष्ठ होता है।
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परमात्मा का निर्गुण-निराकार स्वरुप के चिंतन करने वालों से परमात्मा का सगुण-साकार स्वरुप के चिंतन करने वाले श्रेष्ठ होते हैं।
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जब मन स्थिर हो जाता है तब इन्द्रियाँ स्वयं ही वश में हो जाती है, या इन्द्रियाँ वश में कर लोगे तो मन स्वयं ही वश में हो जायेगा।
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नित्य भगवान के भजन, चिंतन के लिये थोड़ा - थोड़ा समय निकाल कर अभ्यास करो और धीरज रखो, एक दिन पात्रता प्राप्त हो ही जायेगा।
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जिस प्रकार राष्ट्र के नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को सरकार के द्वारा दण्डित किया जाता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के नियमों का उल्लंघन करने पर जीवात्मा को प्रकृति के द्वारा दण्डित किया जाता है।
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मनुष्य को जीवन में चार पुरुषार्थ करने होते है। १. धर्म (शास्त्र-बिधि का पालन), २. अर्थ (धर्मानुसार धन का संग्रह), ३. काम (धर्मानुसार कामनाओं की पूर्ति), ४. मोक्ष (धर्मानुसार सभी कामनाओं का त्याग)।
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॥ अमृत-वाणी - ११ ॥


जब जीवात्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाता है तब वह जीवात्मा परमात्मा से अनन्य भाव से प्रेम करने लगती है।
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शिव ही गुरु हैं, गुरु ही शिव हैं, दोनों में जो अन्तर मानता है, तीनो लोकों मे उसके समान पापी और कोई नही होता है।
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ब्रह्मज्ञानी एकान्त प्रिय, कामना रहित, चिन्ता मुक्त, राग-द्वेष रहित, मान-अपमान रहित और शांत-चित्त वाला होता है।
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यदि शिव जी नारज़ हो जायें तो गुरुदेव बचाने वाले हैं, किन्तु यदि गुरुदेव नाराज़ हो जायें तो बचाने वाला कोई नहीं।
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सांसारिक व्यवहार सहजता से निभाते चलो जो हो जाय तब भी सही और जो न हो तब भी सही मानकर सन्तोष करो।
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अज्ञान की जड़ को उखाड़ने वाले, ज्ञान और वैराग्य को सिद्ध करने वाले श्री गुरुदेव के चरणामृत का पान करना चाहिये।
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परमात्मा हर प्राणी के हृदय में परम-मित्र भाव में रहता है, उसे केवल शास्त्रानुसार कर्म करके ही जाना जा सकता है।
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गुरु वही हैं जो नित्य, निर्गुण, निराकार, परम ब्रह्म का अनुभव करते हुए शिष्य के मन में ब्रह्म भाव को प्रकट कराते हैं।
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सदगुरु वही होता है जो सभी प्रकार के भ्रम का जड़ से मिटाने वाला और जन्म, मृत्यु तथा भय से मुक्त कराने वाला हैं।
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जैसे भृंगी कीट भ्रमर का चिन्तन करते-करते भ्रमर स्वरुप बन जाता है वैसे ही जीव ब्रह्म का ध्यान करते-करते ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
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जो ज्ञान-योग और भक्ति-योग में भेद करता है उसकी बुद्धि अभी भगवद-पथ पर अज्ञान से आवृत है।
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जिस प्रकार राष्ट्र का संविधान पुस्तकों में वर्णित हैं, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड का संविधान शास्त्रों में वर्णित हैं।
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केवल भक्ति-योग द्वारा भगवान को पाने की इच्छा करने पर भगवद-प्राप्ति रुपी परम-सिद्धि शीघ्र प्राप्त होगी।
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जब तक पाप और पुण्य में उलझे रहोगे तो प्रकृति के तीनों गुणों के आधीन होकर बंधन में ही पडे रहोगे।
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ज्ञान-योग से भक्ति मिले या भक्ति-योग से ज्ञान, दोनो ही मार्गो से एक ही लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति होती है।
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॥ अमृत-वाणी - १० ॥


अमीर वह है जिसका मन (चेतन तत्व) परमात्मा मे स्थित है गरीब वह है जिसका मन (ज़ड पदार्थ) तन और धन में स्थित है।
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जिस प्रकार शक्तिमान से शक्ति अलग नही हो सकती है उसी प्रकार ज़ड और चेतन प्रकृति परमात्मा से अलग नही हो सकती है।
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जब तक जीवात्मा भक्ति-कर्म या सांसारिक-कर्म सकाम भाव (फ़ल की इच्छा) से करता रहेगा, तब तक जन्म-मृत्यु के बंधन में ही फ़ंसा रहेगा।
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जब जीवात्मा भक्ति-कर्म या सांसारिक-कर्म निष्काम भाव (बिना फ़ल की इच्छा) से करेगा, तभी उसे ब्रह्म-ज्ञान (परमात्मा का ज्ञान) प्राप्त हो सकेगा।
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जब किसी जीवात्मा का सत्संग के द्वारा विवेक जाग्रत हो जाता है तभी जीव का मिथ्या अहंकार (शरीर का आकार), शाश्वत अहंकार (आत्मा का आकार) में परिवर्तित हो पाता है और तब अज्ञान का आवरण हटने लगता है।
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अज्ञानता और भ्रमवश प्रत्येक मनुष्य स्वयं को ज्ञानी और दूसरे व्यक्ति को अज्ञानी समझता है।
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जब जीवात्मा में ब्रह्म-ज्ञान प्रकट होता है तभी जीवात्मा को भगवान की शरणागति प्राप्त होती है।
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जब जीव को भगवान की शुद्ध-भक्ति प्राप्त होती है तभी जीव पूर्ण मुक्त होकर भगवान को प्राप्त होता है।
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जो मनुष्य अपने शरीर को साधन मानकर कामना रहित साधना करता है वही मोक्ष को प्राप्त करता है।
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जब जीवात्मा को भगवान की शरणागति प्राप्त होती है तभी जीवात्मा का परमात्मा से साक्षात्कार होता है।
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जब जीवात्मा भगवान से अनन्य-भाव से प्रेम करती है तभी जीवात्मा को भगवान की शुद्ध-भक्ति प्राप्त होती है।
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तन, मन और धन की उपयोगिता तभी है, जब तन एवं धन परमार्थ में और मन भगवान के स्मरण में लगे।
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जैसे छात्र सांसारिक ज्ञान के लिये विधालय जाते है वैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान के लिये सत्संग मे जाना चाहिये।
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जो जीवात्मा जिस किसी की भी निन्दा एवं स्तुति करता है वह उसके गुण और अवगुण भी ग्रहण कर लेता है।
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सदगुरु वही होता है जो संशय, दया, भय, संकोच, निन्दा, प्रतिष्ठा, कुलाभिमान और संपत्ति से निवृत्ति करा देता है।
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॥ अमृत-वाणी - ९ ॥


निरन्तर सत्संग करने से अज्ञान का आवरण हट जाता है और ज्ञान स्वयं प्रकट होने लगता है।
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मन भ्रमित होने से जीवात्मा की चेतन शक्ति विखर जाती है जिससे साधन अवरुद्ध हो जाता है।
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मन को परमात्मा चिंतन में आगे और व्यवहारिक चिंतन में पीछे रखोगे तो मोक्ष की प्राप्ति होगी।
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स्वस्थ तन और धन-सम्पदा यदि प्रारब्ध में होगे तो मिलेंगे ही फ़िर मन को इनमें क्यों फ़ंसाते हो।
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परमात्मा का अंश जीवात्मा, ज़ड प्रकृति के सम्पर्क में आने के कारण चेतन प्रकृति ही कहलाता है।
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आध्यात्मिक शिक्षा का अभाव ही विश्व में भ्रष्टाचार, हिंसा, बलात्कार और पापाचार का मुख्य कारण है।
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यह शरीर और धन-सम्पदा यहीं रह जायेंगे इसलिये इन्हे निजी स्वार्थ मे न लगाकर परमार्थ में लगाओ।
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शक्तिमान और शक्ति की अभिन्नता ही सृष्टि उत्पत्ति का एक मात्र कारण है, इसलिये सृष्टि भी अविनाशी है।
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मन में किसी भी प्रकार का भ्रम नही होता है जब बुद्धि मन का विरोध करती है तब मन भ्रमित हो जाता है।
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मन को व्यवहार मे लगाये बिना भी व्यवहार यथावत चलता रहेगा, कौशिश करके धीरज रखोगे तभी पता चलेगा।
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मन को व्यवहारिक चिंतन में आगे और परमात्मा चिंतन में पीछे रखोगे तो जन्म-मृत्यु के बंधन में फ़ंसे रहोगे।
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परमात्मा का अंश जीवात्मा, ज़ड प्रकृति के सम्पर्क में रहने के कारण मोहग्रस्त होकर सांसारिक बंधन में फ़ंसा रहता है।
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सर्व शक्तिमान परमात्मा की दो मुख्य शक्तियाँ है चेतन प्रकृति (जीवात्मा) और ज़ड प्रकृति (माया) दोनों ही अविनाशी हैं।
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भौतिक शिक्षा से बुद्धि का पूर्ण विकास सम्भव नही है, केवल आध्यात्मिक शिक्षा से ही बुद्धि का पूर्ण विकास हो सकता है।
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जब तक ज़ड और चेतन का संयोग बना है तब तक सभी जीवात्मा किसी न किसी रुप में एक-दूसरे के निमित्त बनते ही रहेंगे।
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॥ अमृत-वाणी - ८ ॥


कलियुग में केवल "श्री मद्‍ भगवत-गीता" का ही श्रवण, अध्यन एवं मनन और आचरण के द्वारा ही मुक्ति संभव है।
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जगत में जो दृष्टा बनकर रहता है, वह संसार में किसी की भी निन्दा या स्तुति नही करता है वही यथार्थ देख पाता है।
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संसार के सभी प्राणी पूर्ण ज्ञानी है परन्तु सभी के ज्ञान पर मिथ्या अहंकार के कारण अज्ञान का आवरण चढा हुआ है।
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सर्वशक्तिमान भगवान साक्षात् वाणी "श्री मद्‍ भगवत-गीता" के अनुसार कर्म करने से ही सुख, शान्ति और आनन्द की प्राप्ति होगी।
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परमात्मा को मन और बुद्धि से नही केवल आत्मा से जाना जा सकता है परमात्मा तो मन, बुद्धि से परे परम-आत्म स्वरुप है।
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पुण्य कर्म करने से पाप कर्म नष्ट नही होते है, पुण्य कर्म का फ़ल भी भोगना पडेगा और पाप कर्म का फ़ल भी भोगना ही पडेगा।
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परमात्मा की प्राप्ति केवल मनुष्य-योनि में ही होती है, क्योंकि मनुष्य-योनि ही कर्म-योनि है अन्य योनियाँ तो भोग-योनि होती है।
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समदर्शी वही है जो संसार की प्रत्येक ज़ड वस्तु को परमात्मा का स्वरूप और प्रत्येक जीवात्मा को परमात्मा का अंश समझता है।
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परमहंस-अवस्था और गोपी-भाव एक ही अवस्था होती है, गोपी-भाव में स्थित जीवात्मा को ही भगवान की शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है।
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भगवद-प्राप्ति की इच्छा जब तक दृढ़ न होगी तब तक अनेकों वासनाओं के चक्कर में पतंग की भाँति न जाने कहाँ-कहाँ उडते फिरोगे।
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जो अपने धर्म का पालन करते हुए मरता है उसकी सदगति होती है और जो दूसरों के धर्म को अपनाकर मरता है उसकी दुर्गति होती है।
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कामना रहित होकर वर्णाश्रम के अनुसार हर परिस्थितियों को भगवान का प्रसाद समझकर जो भी कार्य किया जाता है, वही नियत कर्म भगवान की आराधना ही है।
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स्वच्छ राष्ट्र का निर्माण केवल वर्णाश्रम धर्म के अनुसार ही हो सकता है यह राज-तंत्र में ही सम्भव हो सकता है लोक-तंत्र मे नही हो सकता है जो कि कलियुग में असंभव है।
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केवल "श्री मद्‍ भगवत-गीता" ही सभी शास्त्रों (वेदों, उपनिषदों, पुराणों) का पूर्ण सार है, नित्य गीता का अध्यन करने से धर्म की शिक्षा मिलेगी जिससे धर्म का आचरण होने लगेगा और अधर्म से बच जाओगे।
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शास्त्र-अनुकूल पुरुषार्थ से ही सांसारिक शान्ति, पुण्य-कर्म का संग्रह और मोक्ष की प्राप्ति होती है, शास्त्र-प्रतिकूल पुरुषार्थ से ही सांसारिक अशान्ति, पाप-कर्म का संग्रह और बन्धन की प्राप्ति होती है।
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॥ अमृत-वाणी - ७ ॥


महात्मा वही है जिसके मन में भगवान का स्मरण बना रहता है, और सभी इन्द्रियाँ भगवान की सेवा करने में लगी रहती हैं।
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जैसा संग करोगे वैसे ही गुण-दोष आयेंगे और वैसा ही कर्म होगा, धर्म के अनुसार कर्म करने से परमात्मा से प्रेम होने लगता है।
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निष्काम भाव से कर्म करने से परम-सिद्धि की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करने के बाद कुछ भी प्राप्त करना शेष नही रहता है।
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शरीर में पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ कान, आँख, जीभ, नाक और त्वचा होती है और इनके पाँच विषय शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्शं होते है।
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जैसे छात्र अध्यापकों की आज्ञानुसार पुस्तकों का अध्यन करता है वैसे ही सत्संगी को गुरु की आज्ञानुसार शास्त्रों का अध्यन करना चाहिये।
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निष्काम-प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है, इस प्रेम को भक्ति कहते है, संसार में तो सकाम-प्रेम होता है, यह प्रेम व्यापार के रूप में ही होता है।
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सन्यासी वही है जिसका मन सहित शरीर से विषयों का सम्पर्क नही है, पाखंडी वह है जिसका इन्द्रियों से विषयों का सम्पर्क नही रहता है परंतु मन में विषयों का चिंतन बना रहता है।
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देवता वह है जिसका तन विषय भोगों में लिप्त रहता है परंतु मन से भगवान की आज्ञा का पालन करता है, असुर वह है जिसका तन और मन विषय भोगों में ही लगा रहता है।
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भक्त वह है जो तन से कर्तव्य-कर्म करता है और मन, वाणी से निरन्तर भगवान का स्मरण करता है, अभक्त वह है जो वाणी से तो भगवान का नाम जपता है और मन से दूसरों का बुरा चाहता है।
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भगवान का भक्त बनो, भगवान का भक्त बनना सबसे आसान कार्य है, जो भी कार्य करो भगवान के लिये करो और भगवान को याद करके करो, भगवान का भक्त कभी दुखी नही होता, यह कल्पना नहीं बल्कि यह सत्य अनुभूति है।
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परमात्मा का नाम परमात्मा से भी अधिक शक्तिशाली है, जो कि अप्रकट परमात्मा को भी प्रकट करा देता है।
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परमात्मा में मन लगेगा तो स्वभाविक रुप शांति और संतोष का अनुभव होगा एवं सब प्रकार की उन्नति होगी।
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जो दूसरों के गुणों और दोषों का चिन्तन करते है तो दूसरो के गुण और दोष उसके अन्दर स्वत: ही आ जाते है।
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आसुरी स्वभाव वाला अपनी इच्छानुसार पुरुषार्थ करता है, और दैवीय स्वभाव वाला शास्त्रानुसार पुरुषार्थ करता है।
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गोपी-भाव में वही स्थित है जिसने बुद्धि सहित मन और अहंकार को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दिया है।
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॥ अमृत-वाणी - ६ ॥


जब तक बुद्धि द्वारा मन शरीर (ज़ड प्रकृति) में स्थित रहता है तब तक जीव अज्ञानी ही है, जब बुद्धि द्वारा मन आत्मा (चेतन प्रकृति) में स्थित होने लगता है तभी जीव का अज्ञान दूर होने लगता है।
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परमात्मा सर्व शक्तिमान है ज़ड-प्रकृति और चेतन-प्रकृति परमात्मा की दो मुख्य शक्तियाँ है, सृष्टि की उत्पत्ति का कारण ज़ड-प्रकृति (शरीर) और चेतन-प्रकृति (आत्मा) का संयोग मात्र है।
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बुद्धि का उपयोग केवल तन और धन की शुद्धि के लिये करोगे तो मन की शुद्धि कभी नही होगी, बुद्धि का उपयोग केवल मन की शुद्धि के लिये करोगे तो, तन और धन की शुद्धि स्वत: हो जायेगी हैं।
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परमात्मा के बिना तो सभी अनाथ हैं सभी जीवात्मा एक परमात्मा की ही संतान है, इसलिये एक इष्ट (ईश्वर का कोई एक रुप) में श्रद्धा रखो, एक इष्ट में श्रद्धा ही सभी अनिष्टों से बचने का एक मात्र उपाय है।
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सत्संग के बिना विवेक जाग्रत नही होगा, बिना विवेक जाग्रत हुए सत्य और असत्य का भेद नही जान पाओगे, सत्संग भी भगवान की कृपा से ही मिलता है जब भी सत्संग मिले तो समझो भगवान की कृपा मिल रही है।
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विद्वान वही है जो वेद-शास्त्रों के अनुसार परमात्मा को प्राप्त करने के लिये विधिवत उपासना करे।
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वैरागी वह है जिसका शरीर से विषयों का सम्पर्क रहता है परंतु मन में विषयों का चिंतन नही है।
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उस पूँजी को जमा करो जो साथ जायेगी, ऎसी पूँजी जमा करने से क्या लाभ जो यहीं रह जायेगी।
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सकाम-भाव से जप, तप, पूजा और पाठ करने से सिद्धियाँ प्राप्त होती है, इसमें कोई संशय नहीं है।
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परमहंस वह होते हैं जो शरीर को प्रकृति में और आत्मा को परमात्मा में सहज-भाव से विलीन कर देते है।
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जीवन की हर परिस्थिति को परमात्मा का प्रसाद समझकर ग्रहण करते हुए भगवान का स्मरण करते रहो।
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जिनके शास्त्रानुसार कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं उन्हे अधिक से अधिक एकान्त जीवन यापन करना चाहिये।
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जैसा सोचोगे वैसा ही कर्म होगा इसलिये मन से कभी बुरा मत सोचो तो आप से कभी पाप-कर्म नही होगा।
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संसार में जो कुछ भी हुआ, जो कुछ भी हो रहा है और जो कुछ भी होगा, वह सब भगवान के संकल्प से ही होता है।
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संत वही है जिसकी मन सहित सभी इन्द्रियाँ शान्त रहती है, साधु वही है जिसने मन सहित सभी इन्द्रियाँ को साध लिया है।
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॥ अमृत-वाणी - ५ ॥



भक्ति-मार्ग में प्रवेश तभी मिलता है जब जीव को भगवान की कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाता है।
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जैसे लोगो के संगति करोगे वैसा स्वभाव बनेगा और वैसे ही कर्म होंगे और वैसा ही फ़ल पाओगे।
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अनन्य भाव से सर्वत्र सर्वव्यापी परमात्मा को देखने की दृष्टि मिलने पर ही भक्ति-मार्ग पर प्रवेश होता है।
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ज्ञान (लिखित) जब तक विज्ञान (अनुभव) में परिवर्तित नही होगा तब तक आनन्द की प्राप्ति नही होगी।
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ज़ड प्रकृति में सुख-दुख की, चेतन प्रकृति में आनन्द की और परमात्मा में ही परम-आनन्द अनुभूति होती है।
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भय प्रकृति में होता है, परमात्मा तो अभय सत्ता है, शरीर प्रकृति से मिला है और आत्मा परमात्मा से मिली है।
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स्वधर्म के आचरण से ही सुख एवं शान्ति मिलती है, धर्म-विरुद्ध आचरण से दुख और अशान्ति ही प्राप्त होगी।
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सभी के कर्मों को जो जानता है वही परमात्मा अन्तर्यामी है उसकी दृष्टि से बचकर कोई कार्य नही हो सकता है।
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जब तक प्रत्येक व्यक्ति धर्म के अनुसार आचरण नही करेगा तब तक स्वच्छ समाज की स्थापना नही हो सकती है।
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परमात्मा कण-कण में व्याप्त है जब तक सर्वत्र परमात्मा की अनुभूति नही होती है तब तक अज्ञान बना ही रहता है।
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पूजा, उपासना, भजन, चिंतन जब तक निष्काम भाव से नही करोगे तब तक परमात्मा की कृपा मिलना असंभव है।
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संसार में भौतिक विकास ही अशान्ति का मुख्य कारण है, भौतिक संयोग से क्षणिक सुख और वियोग से चिर दुख होता है।
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विश्व में जितना अधिक भौतिक विकास होगा उतनी ही भौतिक वस्तु में आशक्ति होगी, उतनी अधिक विश्व में अशान्ति बढेगी।
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भौतिक विकास के लिये बुद्धि का उपयोग करोगे तो जीवन का दुरूपयोग होगा, परमात्मा के लिये बुद्धि का उपयोग करोगे तो जीवन का सदुपयोग होगा।
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प्रत्येक व्यक्ति को भक्ति-मार्ग में प्रवेश पाने के लिये ही कर्म करने चाहिये, जिसे भक्ति मार्ग में प्रवेश मिल गया है केवल उसी की यात्रा सही दिशा में हो रही है।
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॥ अमृत-वाणी - ४ ॥


कर्तव्य कर्म (स्वधर्म पालन) करते हुए संसार में कार्य करो, परन्तु निस्वार्थ-भाव से प्रेम केवल परमात्मा से करो।
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इस जीवन-यात्रा की तैयारी तो करके आये हो अब तो ऎसी तैयारी करो जिससे आगे की जीवन-यात्रा मंगलकारी हो।
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संसार के व्यवहार में केवल कर्त्तव्य बुद्धि रखने से सांसारिक कामनायें कम होंगी, तभी भगवान में मन लग सकेगा।
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इस जीवन की सांसारिक कामनायें अगले जन्म मे पूर्ण होंगी, और भगवदीय कामनायें इसी जन्म में पूर्ण हो जायेगी।
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वर्णाश्रम के अनुसार कार्य करना ही स्वधर्म पालन है, स्वधर्म पालन किये बिना भगवान के निकट पहुँचना असंभव है।
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राष्ट्र की उन्नति केवल वर्णाश्रम के अनुसार कर्म करने से ही संभव होगी इसलिए देश में शास्त्रीय शिक्षा की आवश्यकता है।
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यह शरीर पूर्व जन्मों के कर्मों के फ़लों को भोगने के लिये मिला है, इस जीवन के शारीरिक सुख और दुख पूर्व जन्मों के कर्मो का फ़ल है।
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काम, क्रोध, लोभ और मोह यही जीव के सबसे बडे अन्दरूनी दुश्मन है, इन दुश्मनों को मिटा दोगे तो संसार में कोई दुश्मन पैदा ही नही होगा।
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इस जीवन में जो भी सांसारिक भोग की इच्छा करोगे वह अगले जन्मों में पूर्ण होंगी, जीवात्मा जैसी इच्छा करता है भगवान उसकी वैसी इच्छापूर्ति करते है।
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इस जीवन के मानसिक सुख और दुख इसी जीवन के कर्मो का फ़ल है, इस जीवन के मानसिक सुख और दुख अगले जीवन के शारीरिक सुख और दुख होंगे।
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सत्संग का अर्थ, सत्य का संग, भगवान का नाम, रुप और गुण का संग है वाकी सब असंग है, निरन्तर सत्संग करने से ही भगवान के स्वरूप का दर्शन हो जाता है।
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शास्त्रों की आज्ञा मानकर आचरण करना धर्माचरण कहलाता है, धर्माचरण से ही पाप कर्मों से बच सकोगे, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य को जानने में शास्त्र ही एक मात्र प्रमाण है।
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शास्त्रों की आज्ञानुसार कार्य करना धर्म होता है, और शास्त्रों के विपरीत कार्य करना अधर्म होता है, धर्म के अनुसार कार्य करना पुण्य-कर्म और धर्म के विरुद्ध कार्य करना पाप-कर्म है।
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जब भी कोई सुन्दर स्त्री या पुरुष या किसी भी वस्तु के प्रति आकर्षण हो तब सोचो जिसने इन्हे बनाया वो कितना सुन्दर होगा, इतना सोचने मात्र से मन के सारे विकार शान्त हो जायेंगे।
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मानव जीवन पानी के बुलबुले के समान है न जाने कब यह बुलबुला फ़ूट जाये, धर्माचरण न करने पर व्यवहार और परमार्थ दोनों बिगड जाते हैं, धर्मानुसार व्यवहार ही परमार्थ का मार्ग है।
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॥ अमृत-वाणी - ३ ॥


जब तक स्वयं को कर्ता मान कर कार्य करते रहोगे तो बंधन में ही फ़ंसे रहोगे, और अकर्ता बन कर कर्म करोगे तो बंधन से मुक्त हो जाओगे।
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फ़ल की इच्छा से कार्य करने से सकाम-भाव की उत्पत्ति होती है, और फ़ल की इच्छा के बिना कार्य करने से ही निष्काम भाव की उत्पत्ति होती है।
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स्वभाव का अर्थ होता है अपना भाव, केवल भाव ही अपना है और भाव ही सबसे बलवान है, इस भाव से ही अप्रकट परमात्मा भी प्रकट कर सकते हो।
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पदार्थ (अनित्य वस्तु) वह होता जिसका रुप और आकार बदल जाता है, तत्व (नित्य वस्तु) वह होता जिसका रुप और आकार कभी नही बदलता है।
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दूसरों को जानने का प्रयत्न करते रहोगे तो स्वयं को कभी नही जान पाओगे, स्वयं को जानने का प्रयत्न करोगे तो एक दिन परमात्मा को भी जान जाओगे।
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अपनी सभी वासना (इच्छा) रूपी धागों को इकट्ठा करके भगवद्-इच्छा रूपी मोटी रस्सी तैयार करो, इसी रस्सी के सहारे भव-कूप (संसार) से बाहर निकलने का प्रयत्न करो।
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जीवन में शान्ति चाहते हो तो सांसारिक व्यवहार में मन को मत फँसाओ, मन को भगवान में लगाने का प्रयत्न करो, भगवान में मन लगने पर ही मन शान्त होगा।
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संसार के चिंतन से मन अशुद्ध होता है, परमात्मा के चिंतन से मन शुद्ध होता है मन के पूर्ण शुद्ध होने पर ही नित्य अविनाशी आनन्दस्वरूप परमात्मा प्रकट होता है।
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जो कुछ भी दिखाई देता है वह सब अनित्य वस्तु (संसार) है, और जो दिखाई नही देता वह नित्य वस्तु है नित्य वस्तु (परमात्मा) का ही अस्तित्व है, अनित्य वस्तु का कोई अस्तित्व नही है।
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भगवान की माया (धन, सम्पदा और परिवार) को प्राप्त करने की इच्छा मत करो, माया-पति (भगवान) को पाने की इच्छा करोगे तो माया तो पीछे स्वयं ही चली आयेगी, क्योंकि माया तो भगवान की एक पतिव्रता स्त्री के समान है।
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परमात्मा से कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा ही परमात्म-सिद्धि को प्राप्त करने में सबसे बडी बाधा है।
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केवल लक्ष्मी के भक्त न बनकर लक्ष्मी-नारायण के भक्त बनोगे, तो लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहेगी।
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क्षणभंगुर सांसारिक स्वार्थों में ही लिप्त रहोगे तो जीवन में भगवान की कृपा-सिद्धि को कैसे प्राप्त कर पाओगे।
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मन में क्षणभंगुर संसार का विचार कम करने से कामनायें सिमटने लगेंगी, और मन भगवान में लगने लगेगा।
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संसार में कमल के पत्ते की तरह रहो, जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहते हुए जल का स्पर्श नही करता है।
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॥ अमृत-वाणी - २ ॥



धर्मानुसार कार्य करने पर वही कार्य होगें, जिनसे वर्तमान में मन को आनन्द मिलेगा और भविष्य में परमानन्द स्वरुप की प्राप्ति होगी।
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एकान्त में रह कर ही शान्ति का अनुभव होगा, यदि एकान्त में न रह सको तो अच्छे लोगों का संग करो और बुरे लोगों के संग से दूर रहो।
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मन की शुद्धि निष्काम-भाव (बिना फ़ल की इच्छा) से कार्य करने से ही होगी, सकाम-भाव (फ़ल की इच्छा) से मन की शुद्धि कभी नही होगी।
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मनुष्य जीवन में संगति का सबसे अधिक प्रभाव पडता है, पाप कर्म से बचना चाहते हो तो दुष्ट स्वभाव वालों की संगति से हमेशा दूर रहो।
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सत्संग के बिना परमात्मा को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती है, जब तक जिज्ञासा उत्पन्न नही होगी तब तक भगवान की प्राप्ति असंभव है।
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संसार से प्रेम करने से दुख के अलावा और कुछ नही मिलता है, परमात्मा से प्रेम करने से ही आनन्द की प्राप्ति होगी।
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जो समय का मूल्य जानेगा वही समय का सदुपयोग कर पायेगा, संसार में समय से अधिक मूल्यवान वस्तु और कोई नही है।
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जगत से प्रेम करोगे तो जन्म-मरण के चक्कर में पडे रहोगे, जगदीश से प्रेम करोगे तो जन्म-मरण से मुक्त को जाओगे।
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जीवात्मा अज्ञानता के कारण चाहता कुछ है और इच्छा किसी अन्य की करता है, जैसी इच्छा करते हो वैसा ही प्राप्त करते हो।
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सांसारिक वस्तु का चिन्तन करोगे तो चिन्ताओं से ग्रस्त रहोगे, भगवान का चिन्तन करोगे तो सभी चिन्ताओं से मुक्त हो जाओगे।
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मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य माया-पति की शरण में जाकर माया को पार करके भगवान की अनन्य भक्ति प्राप्त करना होता है।
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स्वयं को कर्ता मान कर कार्य करने से सकाम-कर्म होता है, और स्वयं को अकर्ता मान कर कार्य करने से निष्काम-कर्म होता है।
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ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास न करो, अज्ञानता दूर करने का प्रयत्न करो, अज्ञानता दूर होते ही एक दिन ज्ञान स्वयं प्रकट हो जायेगा।
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सकाम-भाव से कार्य करते रहोगे तो संसारिक बंधन में बंधे रहोगे, निष्काम-भाव से कर्म करने पर ही भगवान की भक्ति प्राप्त कर सकोगे।
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जो निर्गुण-निराकार है उसे सगुण-साकार करने का प्रयत्न करो, परमात्मा निर्गुण-निराकार भी है और वही परमात्मा सगुण-साकार भी है।
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